क्या चल रहा है?

जेल से रिहा हुए स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पुनिया, रिहाई के बाद बताई ये बात…

नई दिल्ली: सिंघु बॉर्डर पर किसानों के प्रदर्शन स्थल से गिरफ्तार हुए स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पुनिया को दिल्ली की एक अदालत ने जमानत दे दी है. रिहाई के बाद पुनिया ने कहा कि पत्रकार को डरना नहीं चाहिए. जितना सरकार आपको दबाती हैं उतनी ही तेज़ी से स्प्रिंग की तरह पत्रकार को उछालकर काम करना चाहिए. सरकार हमारी क़लम से डरती है, इसलिए हमें अपनी क़लम रुकना नहीं चाहिए.

उन्होंने कहा, मैं कहना चाहूंगा कि मैं ग्राउंड ज़ीरो, से रिपोर्ट कर रहा था कई लोगों को सरकार ने जेल में डाल रखा है. कप्पन साहब तो जेल में हैं, इन सब को रिहा किया जाए. मैं ज़रूर सिंघु बॉर्डर जाऊँगा. जिस संवेदनशीलता से किसान आंदोलन को कवर करने की ज़रूरत है वो करूंगा, जो भी सत्ता की कमज़ोरी उजागर करता है उसको गिरफ़्तार कर लिया जाता है.

रिहाई के बाद सुनाई अपनी आपबीती

अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि मैं बैरिकेड के पास खड़ा होकर रिपोर्ट कर रहा था. वहां कुछ प्रवासी मजदूर थे, जो निकलने की कोशिश कर रहे थे. पुलिसवाले उन्हें लगातार गालियां दे रहे थे. पुलिसकर्मियों ने पहले पत्रकार धर्मेंद्र को खींच लिया. मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन्होंने कहा कि ये रहा मनदीप पुनिया इसे भी खींच लो. उन्होंने मुझे भी खींच लिया और ताबड़तोड़ लाठियां बरसानी शुरू कर दी. मनदीप ने बताया कि उन्होंने सिंघु बॉर्डर पर किसानों पर पथराव करने वालों के बारे में बताया था कि ये BJP के कार्यकर्ता हैं. उनमें से 5 लोग तो पदाधिकारी थे. जिसके बाद मुझे दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया.  

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जेल में बंद किसानों ने सुनाई संघर्ष की कहानी

जेल में मेरे साथ रह रहे जसविंदर सिंह ने कहा कि शायद सत्ता को हमारे इतिहास का पता नहीं है. हमारा इतिहास ही लड़ने का रहा है और हमने अलग अलग दौर में संघर्ष किया है. उन्होंने मुझे किसानों के संघर्ष की कहानी सुनाई. दुल्ला भट्टी ने किसानों के लिए बहुत कुछ किया. उनका कहना था कि यह लड़ाई हम मज़बूती से लड़ेंगे.

रिपोर्ट के लिए शरीर पर लिखे किसानों के बयान

पत्रकार मनदीप पुनिया ने बताया कि जेल में उनके साथ अच्छा सलूक किया गया. मुझे जिस वार्ड में रखा गया था वहां किसान भी थे. उन्होंने मुझे अपनी कहानियां सुनाई और चोटों के निशान भी दिखाए. फिर मैंने पीड़ितों के बयान लेकर अपनी रिपोर्ट के लिए पैन से अपने शरीर पर किसानों के बयान लिखे. वहां मौजूद किसान मज़बूत तो थे, लेकिन उनकी चिंताएं ये थी कि उनके ऊपर क्या क्या धाराएं लगाई गई हैं. उनका कहना था कि हमें जेल क्या कालापानी भी भेज दें तो भी हम पीछे नहीं हटेंगे, जब तक कि तीनों क़ानून वापस नहीं हो जाते.

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