क्या चल रहा है?

विराट कोहली को कप्तान रहने दो, पर रहाणे-पुजारा को उनका सम्मान तो दे दो!

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नब्बे के दशक में भारतीय क्रिकेट का मतलब सचिन तेंदुलकर हुआ करता था. होता भी क्यों ना? पहली बार भारत को ऐसा बल्लेबाज़ मिला जिसका लोहा सर डॉन ब्रैडमैन ने भी माना. लेकिन, नई सदी में राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण जैसे दो ऐसे बल्लेबाज़ आए जिन्होंने ये दिखाया कि तेंदुलकर तो कोई और नहीं बन सकता है लेकिन महानता के अलग रास्ते भी हैं. इन दोनों ने अपने दौर की सबसे तगड़ी टीम ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ हमेशा ज़बरदस्त खेल दिखाया और इनके लिए सबसे महानतम दिन 2001 में कोलकाता टेस्ट का चौथा दिन रहा जब ये पूरे दिन एक साथ बल्लेबाज़ी ही करते रह गए. उसके बाद, अगले एक दशक में अलग-अलग मैदानों पर इन दोनों ने ऐसा कमाल दिखाया कि उनके योगदान को भी भारतीय क्रिकेट में तेंदुलकर से किसी भी तरह से 19 नहीं आंका जाने लगा.

रहाणे-पुजारा भी तारीफ के हकदार
मौजूदा दौर विराट कोहली (Virat Kohli) का है. या यू कहें किंग कोहली का. क्रिकेट के मैदान पर सुपरस्टार तो वो हैं ही लेकिन साथ ही बॉलीवुड की एक बेहद सफल अदाकारा के साथ शादी के बाद वो सबसे चर्चित जोड़ी भी भारत में हैं. ऐसा नहीं है कि अंजिक्य रहाणे (Ajinkya Rahane) और चेतेश्वर पुजारा (Cheteshwar Pujara), ख़ासकर टेस्ट क्रिकेट में कोहली से बेहतर हो गए हैं लेकिन इन दोनों खिलाड़ियों ने भी अपने ही शांत और संयम तरीके से भारत का मान बढ़ाया है. शायद ये महज़ इत्तेफाक ही है कि जिस सबसे मुश्किल सीरीज़ में कप्तान कोहली पहले टेस्ट के बाद ही घर लौट आए, उसके बाद टीम को संभालने की ज़िम्मेदारी रहाणे-पुजारा के कंधों पर दे डाली. एडिलेड में 36 के शर्मनाक सफाये के बाद मेलबर्न में कप्तान रहाणे ने ना सिर्फ टेस्ट जिताया, बल्कि अपनी टीम को सीरीज़ में 1-1 की बराबरी पर ले आए. उसके बाद का काम सिडनी और ब्रिसबेन में पुजारा ने किया. दोनों टेस्ट में पुजारा ने भले ही अपने करियर के दो सबसे धीमे अर्धशतक बनाए लेकिन इसकी अहमियत भारतीय क्रिकेट में बेशकीमती है. ये  पुजारा की ही दृढ़ता थी जिसने युवा जोश को भरोसा दिया कि जब तक वो क्रीज़ पर हैं, टीम इंडिया हारेगी तो नहीं. जितनी सीरीज़ जीत कप्तान के तौर पर रहाणे की है उतनी ही श्रेय पुजारा की बल्लेबाज़ी को भी जाता है.

नई पीढ़ी के साथ ताल से ताल मिलाते रहाणे-पुजाराअगर ऋषभ पंत ने सीरीज़ में सबसे ज़्यादा 274 रन बनाए तो पुजारा कहां पीछे थे. उन्होंने भी 271 बना डाले. अगर शुभमन गिल ने 259 रन बनाए तो रहाणे ने भी 268 रन का योगदान दिया. कहने का मतलब ये है कि पुरानी पीढ़ी अब इस उभरती नई पीढ़ी के साथ कदम से कदम मिलकार चलना जानती है जैसा कि द्रविड़-लक्ष्मण की जोड़ी सहवाग-युवराज जैसी प्रतिभाओं के साथ किया करती थी. शायद अब भारतीय क्रिकेट में वक्त आ गया है कि रहाणे-पुजारा को भी वैसा ही सम्मान मिले जैसा कोहली को मिलता है. कप्तान के तौर कोहली की इकलौती उपल्बधि 2018 में ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट सीरीज़ में जीत रही है और वो भी सबसे मज़बूत टीम के साथ. लेकिन, रहाणे ने तो अब तक अपने कप्तानी के करियर में हार का मुंह ही नहीं देखा है. ऐसे में सोचिए कि आज कोहली की जगह रहाणे और रहाणे की जगह कोहली होते तो हर कोई जल्द से जल्द 2021 में एक बेहद कमज़ोर सी दिखने वाली लेकिन अदंर से बहुत ही मज़बूत टीम को ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट सीरीज़ जिताने वाले कप्तान को नियमित तौर पर ये ज़िम्मेदारी देने की बहस नहीं उठती? ख़ैर, हम तो कोहली को कप्तानी से हटाने की नहीं, बस रहाणे को उनका यथोचित सम्मान मिलने का आग्रह कर रहे हैं.

2001 वाली टेस्ट सीरीज़ से 2021 की समानता 
एक बहस और समानता की चर्चा 2001 वाली टेस्ट सीरीज़ से भी हो रही है जिसने द्रविड़-लक्ष्मण को वर्ल्ड क्लास साबित किया. उस दौरान ऑस्ट्रेलिया की टीम लगातार 15 टेस्ट मैच जीतकर भारत आई थी और तत्कालीन कंगारु कप्तान स्टीव वॉ ये ‘फाइनल फ्रंट’जीतकर खुद को इतिहास में अमर करना चाहते थे. उनके पास ग्लेन मैक्ग्रा और शेन वार्न तो थे ही, साथ ही माइकल कैस्प्रोविच और जैसन गिलेस्पी भी थे. पहले टेस्ट में मुंबई में उन्होंने भारत को तीन ही दिन में धराशायी कर दिया था. उसके बाद उस सीरीज़ में भारत ने नाटकीय अंदज़ में दूसरा टेस्ट जीता और चेन्नई में खेला गया तीसरा टेस्ट भी आखिरी घंटे तक उतना ही रोमांचक रहा था जितना कि ब्रिसबेन का मैच. अब भारत ने चेन्नई में जो जीत हासिल की उसके बाद से टेस्ट में उस मैदान पर वो अब तक नहीं हारे है जबकि ऑस्ट्रेलिया में इस बार वो हुआ जो गाबा में 33 सालों में नहीं हुआ था.

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कई मायनों में देखा जाए तो ऑस्ट्रेलियाई के दबदबे को पहली बार एक गंभीर चुनौती 2001 में भारत ने अपने मैदान पर दी थी और 2021 में करीब 2 दशक बाद पूरी तरह से उनकी हस्ती को मटियामेट कर दिया. अब टीमों के लिए ऑस्ट्रेलिया को उसी की ज़मीं पर हराने का ख़ौफ सतायेगा नहीं बल्कि प्रेरणा देगा कि अगर भारत अपनी ‘सी’टीम के साथ ऐसा कर सकता है तो वो भी करने का सपना देख सकते हैं. याद है ना 1996 में किस तरह से मार्क टेलर की कप्तानी में ऑस्ट्रेलिया ने जब वेस्टइंडीज़ को उन्हीं के घर पर हराया (करीब 2 दशक बाद किसी टीम ने कैरेबियाई जीत के अश्वमेघ को रोका) तो उसके बाद से कैरेबियाई टीम रसातल में ही चली गई. सफेद गेंद की क्रिकेट में वेस्टइंडीज़ का वजूद तो अब भी है लेकिन लाल-गेंद से उनका साम्राज्य ख़त्म हो चुका है. क्या ऑस्ट्रेलिया के साथ भी टेस्ट क्रिकेट में अब कुछ वैसा ही होने वाला है? मुमकिन है.

अगर नाथन लॉयन अब पहले की तरह धारदार नहीं दिख रहे हैं तो मिचेल स्टार्क को भी ओवररेटेड बताया जाने लगा है. यानि ऑस्ट्रेलियाई आक्रमण जिस पर उनको इतना नाज है, अब पहले जैसा दम नहीं रहा. बल्लेबाज़ी क्रम के तो क्या कहने. वहां पर तो कंगारुओं को काफी विकल्प की ज़रुरत पडेगी.

गेंदबाज़ी में भी 2001 वाली सीरीज़ की झलक
टीम इंडिया के नज़रिए से देखे तो गेंदबाज़ी में भी 2001 वाली सीरीज़ की एक झलक दिखती है. उस सीरीज़ में अनिल कुंबले और जवागल श्रीनाथ नहीं खेले थे, अनफिट होने के चलते. लेकिन, कुंबले ने कंधे पर प्लास्टर लगने के बावजूद युवा हरभजन को ऐसा नेट्स पर गाइड किया कि भज्जी 32 विकेट लेकर उस सीरीज़ में टर्बनेटर बन गए. कुंबले की ही तरह अश्विन भी ब्रिसबेन में नहीं खेले लेकिन युवा वाशिंगटन सुंदर को उन्होंने ये पाठ पढा दिया कि कैसे स्टीव स्मिथ का कीमती विकेट सस्ते में निकालना है और ज़रुरत पड़ने पर बल्ले से भी मैच-विनर की भूमिका निभाई जा सकती है. हो सकता है ये लेख किसी वेबसीरीज़ बनाने वाले क्रिकेट प्रेमी निर्देशक को पसंद आ जाए और दोनों ऐतिहासिक सीरीज़ की तुलना होते हुए हमें एक शानदार कॉमेंट्री भी भविष्य में देखने को मिले! लेकिन, तब तक ये कहने से बिलकुल नहीं हिचकिए कि ब्रिसबेन में टेस्ट जीत कोलकाता 2001 से बड़ी है और ऑस्ट्रेलिया में सीरीज़ जीत उस 2001 वाली सीरीज़ जीत से बड़ी जीत है. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)



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