क्या चल रहा है?

खेलों में ‘पिछड़ी जाति’ तब भी अभिशाप थी, अब भी कलंक है..!

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वो साल 1950 था, जब भारत का संविधान (Constitution of India) लागू हुआ और उसमें साफ कहा गया कि इतिहास की भूलों और ज़्यादतियों को सुधारने के लिए जाति के आधार पर भेदभाव स्वीकारा नहीं जाएगा. संस्थागत ढंग से भले ही किसी तरह जातिवाद को खत्म करने में कामयाबी मिली हो, लेकिन यह एक जगज़ाहिर सीक्रेट से कम बात नहीं है कि भारत में जातिगत भेदभाव की जड़ें कितनी गहरी हैं. जाति के आधार पर पक्षपात किए जाने का यह खेल देश में खेलों के इतिहास (History of Sports) में भी कलंक जैसा रहा है.

कुछ ही समय पहले मुख्यधारा के क्रिकेट में दलित​ खिलाड़ियों को एंट्री न मिलने का विवाद ज़ोरों पर था. अब हैदराबाद में ‘ब्राह्मण क्रिकेट टूर्नामेंट’ के आयोजन किए जाने की खबरों को लेकर एक बार फिर खेलों में जातिवाद को लेकर बहस छिड़ी है. देश में खेलों के इतिहास में जातिवाद के कई किस्से दर्ज हैं. इनमें से तीन ऐसे प्रसंग आपको यहां बताते हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकेगा.

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पहले दलित क्रिकेटर पलवनकर बालूजातिवाद के खिलाफ मैदान के भीतर और बाहर लड़ने वाले बालू को सिर्फ इसलिए याद नहीं किया जाता कि वो पहले दलित क्रिकेटर थे, बल्कि क्रिकेट में कुशलता के लिए उनकी पहचान रही है. 17 साल के बालू को 1892 में पूना क्लब ने पिच की सफाई वगैरह के लिए हायर किया था. फिर बालू को नेट प्रैक्टिस के लिए अंग्रेज़ों और विदेशियों के लिए बॉलिंग करने का काम दिया गया.

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न्यूज़18 क्रिएटिव

यहां से प्रैक्टिस मिली तो एक अच्छे गेंदबाज़ के तौर पर बालू उभरकर आए. कुछ ही समय में बालू भारतीय क्रिकेट के प्रमुख खिलाड़ी के तौर पर पहचाने गए. अंग्रेज़ों के खिलाफ हिंदू जिमखाना की कई जीतों में बालू का योगदान रहा. फैक्ट यह भी है कि 1911 में जब कोई भारतीय टीम पहली बार इंग्लैंड के दौरे पर गई थी, तो बालू उसके हीरो बने थे. बालू ने इस दौरे पर 18.84 के औसत से 114 विकेट लिये थे. इसमें कैम्ब्रिज के खिलाफ 8/103 उनके सबसे शानदार फिगर रहे थे.

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इसके बावजूद बालू को एक तरह से भुला दिया गया. एक क्रिकेटर के तौर पर भी बालू को हमेशा जाति को लेकर ताने सुनने को मिलते रहे. उन्हें टीम से अलग पैवेलियन के बाहर चाय पीने के लिए दी जाती थी, खाने के लिए उनके बर्तन और टेबल सबसे अलग लगा करती थी और मैच के दौरान अगर बालू को हाथ या मुंह धोना हो या पानी भी पीना हो तो दलित समुदाय का ही कोई व्यक्ति उनके लिए यह सर्विस करता था.

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दलित होने के कारण नहीं मिले हेलन को मौके?
बॉक्सिंग से मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स में शिफ्ट होने वाली तुलसी हेलन को उनके पंचिंग स्टाइल और तेज़ फुटवर्क के कारण ‘भारत की लेडी मुहम्मद अली’ तक कहा गया. आखिरकार पिज़्ज़ा डिलीवरी और रिक्शा चलाने जैसे काम करने पर मजबूर हुईं हेलन ने कहा था ‘सिर्फ इसलिए कि मेरा जन्म एक दलित के तौर पर हुआ, मेरे लिए सबसे नीचे की जगह ही मुकर्रर हुई.’

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हेलन को दोहरा संघर्ष करना पड़ा. एक तो दलित होते हुए और दूसरा महिला होने की वजह से. हेलन ने आरोप लगाए थे कि बॉक्सिंग एसोसिएशन के एक अधिकारी ने उनका यौन शोषण करना चाहा था. यह भी कि उनसे करियर को आगे बढ़ाने के लिए खासी रकम मांगी गई थी. कानूनी लड़ाई का रास्ता चुनने वाली हेलन का करियर आखिरकार कहां खत्म हो गया, खबरें भी ठीक से नहीं पहुंचीं.

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बॉक्सिंग के लिए प्रतीकात्मक तस्वीर.

बालू की कहानी जहां एक सदी पुरानी है तो हेलन की कहानी बिल्कुल ताज़ा है, जो बताती है कि जातिवाद के हालात खेलों में कितने सुधरे! अब जानिए एक और बेहद संभावनाशील एथलीट की कहानी.

ज्योति के साथ कैसे हुआ जाति आधारित भेदभाव?
बैंक में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की बेटी और दिल्ली बेस्ड एथलीट ज्योति ने 2013, 2014 और 2017 में तीन बार एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता. एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स में भी खेल चुकीं ज्योति के शब्दों में ही उनकी आपबीती इस तरह सुनिए :

दलित होने के अपने नुकसान हैं. ऐसा कई बार हुआ जब मुझे महसूस हुआ कि कथित छोटी जाति के कारण मेरे साथ खराब बर्ताव हुआ. एक घरेलू टूर्नामेंट में सेमीफाइनल में स्पष्ट तौर पर जीतने के बावजूद मुझे हारा हुआ इसलिए घोषित किया गया क्योंकि मैं एक दलित थी. यही नहीं, कांस्य के लिए मुकाबला अगले दिन होना था, लेकिन मुझे पूरा रिकवरी टाइम नहीं दिया गया और सेमी मुकाबले के तुरंत बाद ही यह मुकाबला करवा दिया गया था ताकि मैं जीत न सकूं.

70 किलोग्राम से ज़्यादा की श्रेणी में पहलवानी कर चुकीं ज्योति 2009 से 2016 तक दिल्ली पुलिस में सेवा दे चुकी हैं और आखिरी अपडेट यह था कि वो इनकम टैक्स विभाग में पदस्थ थीं. ये तीन कहानियां बताती हैं कि देश में खेलों में जातिवाद कितने गहरे पैठा रहा और कितने पहले से अब तक भी हम इससे उबर नहीं सके हैं. कितनी संभावनाएं और प्रतिभाएं इस ज़हर की वजह से दम तोड़ चुकी हैं, यह दस्तावेज़ बहुत बड़ा है.



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